सुरभि

बातें आज के वक्त की

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जरा संभलो आज

Posted On: 5 Apr, 2012 Others में

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सेना दिल्ली को बढ़ी , गए पसीने छूट
सोचो होती क्या दशा , खबर न होती झूठ |
खबर न होती झूठ , प्रतिष्ठा न बची रहती
जरा संभलो आज , देश की हालत कहती |
नेताओं को विर्क , जवाब पड़ेगा देना
देखो कदम कठोर , कहीं उठा न ले सेना |

———– दिलबाग विर्क



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
April 6, 2012

सुन्दर प्रस्तुति, सुन्दर विचार. बधाई

dineshaastik के द्वारा
April 6, 2012

मित्र हमारी संवैधानिक  व्यवस्था में तो फिलहाल  ऐसा नहीं दिखता, हाँ, यदि स्थिति भयावह हो जायेगी तो शायद  कल्पना हकीकत में बदल  जाये।

Ankur के द्वारा
April 5, 2012

मित्र बुरा मत मानना, कुंडली मात्रिक छंद होता है, मात्राओं का ध्यान रखते हुए लिखिए, वैसे आपके भाव बहुत अच्छे है. मेरे ब्लॉग पर आइयेगा. आपका स्वागत है. http://www.hnif.jagranjunction.com

    Dilbag Virk के द्वारा
    April 6, 2012

    आपका कहा कबूल है लेकिन मात्राएँ कहाँ गडबडाई हैं यह बताते तो सुधार का प्रयास करता  ——–प्रतिष्ठा न बची रहती——— यदि संदेह का आधार यह पंक्ति है तो विद्वानों की राय में प्र में एक मात्रा है और ———-प्रतिष्ठा———-में कुल पाँच बाकी आपकी विस्तृत टिप्पणी का इंतजार रहेगा जिससे नियम स्पष्ट हो सकें  आभार


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